ईरान के तेल पर हमला क्यों नहीं चाहता अमेरिका? जानें वैश्विक अर्थव्यवस्था और कच्चे तेल का पूरा गणित

आखिर अमेरिकी सीनेटर इजराइल को ईरान के तेल ठिकानों पर हमला करने से क्यों रोक रहे हैं? जानिए कैसे यह एक फैसला दुनिया भर में पेट्रोल-डीजल की कीमतें और वैश्विक मंदी का कारण बन सकता है।

ईरान के तेल पर हमला क्यों नहीं चाहता अमेरिका? जानें वैश्विक अर्थव्यवस्था और कच्चे तेल का पूरा गणित
ईरान के तेल पर हमला

मध्य पूर्व (Middle East) में बढ़ता तनाव इस समय पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय बना हुआ है। जहां एक तरफ इजराइल और ईरान के बीच सीधी जंग के आसार दिख रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति, अमेरिका, इजराइल को एक खास सलाह दे रहा है: "ईरान के तेल बुनियादी ढांचे (Oil Infrastructure) को निशाना न बनाएं।"

लेकिन सवाल यह उठता है कि अमेरिका, जो हमेशा इजराइल के साथ खड़ा रहता है, वह ईरान जैसे दुश्मन देश की अर्थव्यवस्था को बचाने की कोशिश क्यों कर रहा है? इसके पीछे कोई सहानुभूति नहीं, बल्कि शुद्ध 'ग्लोबल इकोनॉमिक्स' और राजनीति है। आइए विस्तार से समझते हैं।

1. वैश्विक तेल बाजार में भूचाल का डर

ईरान दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादकों में से एक है। यदि इजराइल ईरान के तेल रिफाइनरियों या निर्यात बंदरगाहों (जैसे खार्ग द्वीप) पर हमला करता है, तो बाजार से प्रतिदिन लाखों बैरल तेल कम हो जाएगा। जब आपूर्ति (Supply) कम होगी और मांग (Demand) वही रहेगी, तो कच्चे तेल की कीमतें आसमान छूने लगेंगी। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी स्थिति में तेल की कीमतें $100 प्रति बैरल के पार जा सकती हैं।

2. अमेरिका में 'इलेक्शन और महंगाई' का समीकरण

अमेरिका में इस समय राजनीतिक माहौल बेहद संवेदनशील है। राष्ट्रपति चुनाव के आसपास या किसी भी बड़े राजनीतिक घटनाक्रम के दौरान, ईंधन (Gasoline) की कीमतों में बढ़ोतरी सत्ताधारी दल के लिए मुसीबत बन सकती है। अगर पेट्रोल की कीमतें बढ़ती हैं, तो इसका सीधा असर परिवहन और खाद्य वस्तुओं की कीमतों पर पड़ेगा, जिससे महंगाई (Inflation) बढ़ेगी। कोई भी अमेरिकी नेता इस जोखिम को मोल नहीं लेना चाहता।

3. 'हॉर्मुज जलडमरूमध्य' (Strait of Hormuz) का खतरा

ईरान के पास एक ऐसा 'ट्रम्प कार्ड' है जिससे पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था ठप हो सकती है। वह है 'हॉर्मुज जलडमरूमध्य'। दुनिया का लगभग 20% तेल इसी रास्ते से होकर गुजरता है। अगर इजराइल ईरान के तेल क्षेत्रों पर हमला करता है, तो ईरान इस रास्ते को बंद कर सकता है। ऐसा होने पर न केवल ईरान, बल्कि सऊदी अरब, यूएई और कुवैत का तेल भी दुनिया तक नहीं पहुँच पाएगा।

4. वैश्विक मंदी (Global Recession) की आहट

कोरोना महामारी और रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद दुनिया की अर्थव्यवस्था अभी पूरी तरह संभली नहीं है। यूरोप और एशिया के कई देश पहले से ही ऊर्जा संकट से जूझ रहे हैं। तेल की कीमतों में अचानक उछाल आने से वैश्विक उत्पादन लागत बढ़ जाएगी, जिससे दुनिया भर में मंदी आने का खतरा पैदा हो जाएगा।

5. चीन और भारत जैसे बड़े खरीदारों पर असर

ईरान के तेल का एक बड़ा हिस्सा चीन और भारत जैसे देशों में जाता है। यदि इजराइल ईरान की सप्लाई लाइन काटता है, तो इन बड़े देशों को अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए दूसरे विकल्पों पर निर्भर होना पड़ेगा, जिससे वैश्विक प्रतिस्पर्धा और कीमतें दोनों बढ़ेंगी। इससे भू-राजनीतिक तनाव और अधिक जटिल हो सकता है।

कूटनीति बनाम युद्ध

अमेरिकी सीनेटरों और नीति निर्माताओं का मानना है कि ईरान को रोकने के अन्य तरीके (जैसे प्रतिबंध) अपनाए जा सकते हैं, लेकिन तेल अर्थव्यवस्था पर सीधा प्रहार एक 'दोधारी तलवार' साबित होगा। यह हमला ईरान को तो नुकसान पहुंचाएगा ही, लेकिन इसकी तपिश पूरी दुनिया के आम आदमी की जेब तक पहुंचेगी।

यही कारण है कि अमेरिका इस समय इजराइल को सधे हुए कदम उठाने की सलाह दे रहा है ताकि 'ऑयल शॉक' से बचा जा सके।