'न्याय बंद दरवाजों के पीछे रो रहा है': सुप्रीम कोर्ट में भावुक हुईं ममता बनर्जी, खुद वकील बन लड़ी मतदाताओं की लड़ाई
सुप्रीम कोर्ट में खुद वकील बनीं ममता बनर्जी! बंगाल में मतदाता सूची संशोधन (SIR) के खिलाफ भावुक दलील देते हुए कहा- 'न्याय बंद दरवाजों के पीछे रो रहा है'। पूरी खबर पढ़ें।
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए खुद अपनी याचिका की पैरवी की। चुनाव आयोग के 'स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन' (SIR) यानी मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान ममता बनर्जी काफी भावुक नजर आईं। उन्होंने मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत के सामने गुहार लगाते हुए कहा कि, "सर, न्याय बंद दरवाजों के पीछे रो रहा है।"
ऐतिहासिक सुनवाई: जब खुद वकील बनीं मुख्यमंत्री
सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में यह संभवतः पहला मौका है जब कोई मौजूदा मुख्यमंत्री खुद वकील के लिबास में अपनी याचिका पर बहस करने कोर्ट पहुंचा हो। ममता बनर्जी ने CJI सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल पांचोली की पीठ के सामने हाथ जोड़कर लोकतंत्र की रक्षा की अपील की।
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बड़ी शिकायत: ममता बनर्जी ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग (ECI) ने पश्चिम बंगाल को जानबूझकर निशाना बनाया है। उन्होंने कहा कि जो प्रक्रिया 2 साल में पूरी होनी चाहिए, उसे महज 3 महीने में जबरन पूरा किया जा रहा है।
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मतदाताओं के नाम काटने का आरोप: मुख्यमंत्री ने दावा किया कि SIR के नाम पर लाखों वैध मतदाताओं के नाम काटे जा रहे हैं। उन्होंने कहा, "विवाहित महिलाओं के सरनेम बदलने या मामूली स्पेलिंग मिस्टेक के आधार पर नाम हटाए जा रहे हैं, जो पूरी तरह गलत है।"
कोर्ट में ममता की तीखी दलीलें
सुनवाई के दौरान ममता बनर्जी ने खुद को एक 'बंधुआ मजदूर' की तरह बताया और कहा कि वह अपनी पार्टी के लिए नहीं, बल्कि आम जनता के अधिकारों के लिए लड़ रही हैं। उन्होंने चुनाव आयोग को 'व्हाट्सएप कमीशन' करार देते हुए आरोप लगाया कि बीजेपी शासित राज्यों से आए 'माइक्रो ऑब्जर्वर्स' बूथ लेवल अधिकारियों (BLOs) पर दबाव बनाकर नाम कटवा रहे हैं। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि "अगर यह प्रक्रिया बंगाल में हो रही है, तो असम जैसे राज्यों में क्यों नहीं?"
सुप्रीम कोर्ट का रुख
ममता बनर्जी की दलीलों को सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने आयोग को निर्देश दिया कि वे संवेदनशील बनें और मामूली त्रुटियों के आधार पर किसी भी नागरिक का नाम मतदाता सूची से न हटाएं। अदालत ने राज्य सरकार से ऐसे अधिकारियों की सूची भी मांगी है जो स्थानीय बोलियों के जानकार हों, ताकि सत्यापन प्रक्रिया में गलती न हो। मामले की अगली सुनवाई 9 फरवरी 2026 को होगी।





