मध्य प्रदेश: 'घूसखोर पंडित' विवाद और ब्राह्मण बनाम भाजपा की राजनीतिक जंग
मध्य प्रदेश की राजनीति में 'घूसखोर पंडित' विवाद ने ब्राह्मण समाज और भाजपा के बीच तल्खी बढ़ा दी है। प्रीतम लोधी के बयान से शुरू हुई इस राजनीतिक जंग का पूरा विश्लेषण पढ़ें।
मध्य प्रदेश की राजनीति में इन दिनों एक नया उबाल देखने को मिल रहा है। हाल ही में 'घूसखोर पंडित' वाले बयान ने एक बार फिर प्रदेश की सियासत में जातीय ध्रुवीकरण और 'ब्राह्मण बनाम भाजपा' की बहस को तेज कर दिया है। इस विवाद ने न केवल सत्ताधारी दल के लिए मुश्किलें खड़ी की हैं, बल्कि विपक्षी खेमे को भी एक बड़ा हथियार थमा दिया है।
विवाद की जड़: प्रीतम लोधी का वह बयान
यह पूरा विवाद भाजपा के पूर्व नेता प्रीतम लोधी (जो कि पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती के करीबी माने जाते हैं) के उस विवादित बयान से शुरू हुआ, जिसमें उन्होंने ब्राह्मण समुदाय के पंडितों पर आपत्तिजनक टिप्पणी की थी। उन्होंने पंडितों को 'घूसखोर' और 'पाखंडी' बताते हुए कहा था कि ये लोग जनता को गुमराह करते हैं और केवल धन की उगाही करते हैं।
प्रीतम लोधी के इस बयान के बाद राज्यभर के ब्राह्मण समाज में भारी रोष फैल गया। जगह-जगह प्रदर्शन हुए, पुतले फूंके गए और भाजपा सरकार पर कार्रवाई का दबाव बढ़ता गया। हालांकि भाजपा ने डैमेज कंट्रोल करते हुए प्रीतम लोधी को पार्टी से निष्कासित कर दिया, लेकिन क्या यह कदम ब्राह्मण समुदाय की नाराजगी दूर करने के लिए काफी था?
ब्राह्मण बनाम भाजपा: एक पुरानी कसक?
मध्य प्रदेश की राजनीति में ब्राह्मण समुदाय पारंपरिक रूप से भाजपा का कोर वोटर रहा है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में 'सपाक्स' (SAPAKS) आंदोलन और एससी-एसटी एक्ट के विरोध के बाद से इस समुदाय का एक बड़ा वर्ग भाजपा से छिटकता नजर आया है। 'घूसखोर पंडित' जैसे बयान उस घाव पर नमक छिड़कने का काम करते हैं।
जानकारों का मानना है कि भाजपा के भीतर एक बड़ा ओबीसी (OBC) धड़ा अब अपनी ताकत दिखा रहा है। प्रीतम लोधी का बयान सिर्फ एक व्यक्तिगत राय नहीं, बल्कि उस अंतर्द्वंद का परिणाम है जो राज्य में 'अगड़ा बनाम पिछड़ा' की राजनीति को जन्म दे रहा है।
भाजपा के लिए दोहरी चुनौती
भाजपा के सामने इस समय दोराहे वाली स्थिति है। एक तरफ उसे अपने 'कोर ब्राह्मण वोट' को बचाए रखना है, जो राज्य की करीब 10-12% आबादी है और सामाजिक प्रभाव में बहुत मजबूत है। दूसरी तरफ, वह प्रीतम लोधी जैसे नेताओं पर बहुत सख्त कार्रवाई कर ओबीसी समुदाय को नाराज करने का जोखिम भी नहीं उठा सकती, क्योंकि राज्य में ओबीसी की आबादी लगभग 50% के करीब है।





