पुराने फॉर्म में लौटे 'सुशासन बाबू', नीतीश कुमार की 'लास्ट मिनट' सक्रियता ने सबको चौंकाया
"बिहार की राजनीति में बड़ा बदलाव! मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अचानक अपने पुराने 'कड़क' अंदाज में लौटे। पटना की सड़कों पर औचक निरीक्षण और अधिकारियों में मची खलबली। जानें क्यों 'सुशासन बाबू' की इस सक्रियता ने सबको चौंका दिया है।"
पटना: बिहार की राजनीति में इन दिनों एक बार फिर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की चर्चा जोरों पर है। अक्सर शांत और नपे-तुले कदमों के लिए जाने जाने वाले नीतीश कुमार अचानक अपने पुराने 'कड़क' अंदाज में नजर आ रहे हैं। उनके हालिया औचक निरीक्षणों और बिजली की गति से लिए जा रहे फैसलों ने न केवल विपक्ष, बल्कि खुद उनकी सरकार के अधिकारियों और मंत्रियों को भी हैरत में डाल दिया है।
अचानक एक्टिव मोड में सीएम
पिछले कुछ दिनों से पटना की सड़कों और सरकारी दफ्तरों में एक अलग ही नजारा देखने को मिल रहा है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सुबह-सुबह बिना किसी पूर्व सूचना के विकास कार्यों का जायजा लेने निकल रहे हैं। हाल ही में उन्हें जेपी गंगा पथ और अन्य निर्माण योजनाओं का निरीक्षण करते देखा गया। उनके इस 'सरप्राइज विजिट' से प्रशासनिक महकमे में हड़कंप मचा हुआ है। जो अधिकारी फाइलों की सुस्त चाल के आदी हो चुके थे, वे अब मुख्यमंत्री के डर से समय पर दफ्तर पहुँच रहे हैं।
'पुराने फॉर्म' की वापसी
राजनीतिक गलियारों में इसे नीतीश कुमार के 'पुराने फॉर्म' की वापसी के रूप में देखा जा रहा है। साल 2005 और 2010 के दौर में नीतीश कुमार अपनी इसी कार्यशैली के लिए जाने जाते थे—जब वे खुद जमीन पर उतरकर योजनाओं की मॉनिटरिंग करते थे। बीच के कुछ वर्षों में उनकी छवि एक 'मैनेजर' जैसी हो गई थी, लेकिन अब उनकी इस 'लास्ट मिनट एक्टिविटी' ने संकेत दे दिया है कि वे अब भी बिहार की कमान पूरी मजबूती से थामे हुए हैं।
सबको क्यों हो रहा है आश्चर्य?
नीतीश कुमार की इस सक्रियता ने सबको इसलिए चौंकाया है क्योंकि अगले विधानसभा चुनावों को लेकर कयासों का दौर जारी है। ऐसे समय में जब विपक्षी दल उन्हें कमजोर आंक रहे थे, नीतीश ने अपनी प्रशासनिक पकड़ दिखाकर यह साबित कर दिया है कि उन्हें हल्के में लेना भारी पड़ सकता है।
उनकी इस सक्रियता के पीछे कई मायने निकाले जा रहे हैं:
-
अधिकारियों पर नकेल: चुनाव से पहले सरकारी मशीनरी को चुस्त-दुरुस्त करना।
-
जनता को संदेश: विकास कार्यों की खुद निगरानी कर वे जनता को यह बताना चाहते हैं कि 'सुशासन' अभी खत्म नहीं हुआ है।
-
विपक्ष को जवाब: अपनी सक्रियता से उन्होंने उन विरोधियों का मुंह बंद कर दिया है जो उनके रिटायरमेंट की बातें कर रहे थे।
अधिकारियों में मची खलबली
मुख्यमंत्री के इस तेवर का असर सचिवालय से लेकर जिला मुख्यालयों तक दिख रहा है। अब कोई भी फाइल लंबे समय तक टेबल पर नहीं रुक रही। सीएम खुद हर प्रोजेक्ट की डेडलाइन की समीक्षा कर रहे हैं। पटना के विकास कार्यों में जो सुस्ती दिख रही थी, वह अब तेजी में बदल गई है।
क्या यह 2025 की तैयारियों का शंखनाद है?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नीतीश कुमार की यह अचानक बढ़ी सक्रियता महज़ प्रशासनिक सुधार नहीं है। बिहार में अगले विधानसभा चुनावों की आहट अभी से सुनाई देने लगी है। नीतीश कुमार जानते हैं कि उनकी सबसे बड़ी पूंजी 'साफ छवि' और 'काम करने वाला मुख्यमंत्री' की रही है। पिछले कुछ समय से गठबंधन की राजनीति और स्वास्थ्य संबंधी अफवाहों के बीच उनकी छवि पर जो धूल जमी थी, वे उसे झाड़कर एक बार फिर 'ब्रैंड नीतीश' को स्थापित कर रहे हैं।
सुबह 9 बजे की 'चेक लिस्ट' ने उड़ाई नींद
पटना के विकास भवन और मुख्य सचिवालय में अब सन्नाटा नहीं, बल्कि हलचल रहती है। चर्चा है कि मुख्यमंत्री अब सुबह 9 बजे से ही फीडबैक लेना शुरू कर देते हैं। उनके इस 'लास्ट मिनट एक्शन' का असर कुछ इस तरह दिख रहा है:
-
डेडलाइन का सख्ती से पालन: गंगा पथ (मरीन ड्राइव) के अगले चरण और मेट्रो प्रोजेक्ट में आ रही बाधाओं को उन्होंने व्यक्तिगत हस्तक्षेप कर दूर कराया है।
-
मंत्रियों की क्लास: मुख्यमंत्री अब सिर्फ कैबिनेट मीटिंग में ही नहीं, बल्कि फोन पर भी मंत्रियों से उनके विभागों की प्रगति रिपोर्ट मांग रहे हैं।
-
दौरे और संवाद: वे केवल पटना ही नहीं, बल्कि जिलों का दौरा करने की योजना भी बना रहे हैं ताकि विकास की जमीनी हकीकत जान सकें।
विपक्ष की बेचैनी और गठबंधन का गणित
नीतीश कुमार के इस तेवर से विपक्षी खेमे, खासकर आरजेडी (RJD) में हलचल है। तेजस्वी यादव अक्सर नीतीश सरकार पर 'थकान' का आरोप लगाते रहे हैं, लेकिन नीतीश की इस ताज़ा फुर्ती ने विपक्ष के 'थके हुए मुख्यमंत्री' वाले नैरेटिव को कमजोर कर दिया है।
वहीं, एनडीए (NDA) के भीतर भी इस सक्रियता को सकारात्मक रूप से देखा जा रहा है। बीजेपी के साथ तालमेल बिठाते हुए नीतीश यह स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि बिहार में विकास का चेहरा आज भी वही हैं।
जनता के बीच फिर से 'क्रेज' बनाने की कोशिश
नीतीश कुमार अच्छी तरह जानते हैं कि बिहार की जनता परिणाम मांगती है। उनकी हालिया सक्रियता में एक खास पैटर्न दिख रहा है—जनता से जुड़ाव। वे अब अधिकारियों के बजाय खुद मौके पर जाकर लोगों की समस्याओं को सुन रहे हैं। इससे न केवल प्रशासन पर दबाव बढ़ रहा है, बल्कि आम जनता के बीच यह संदेश जा रहा है कि उनका मुख्यमंत्री अब भी उनके लिए सड़कों पर है।
क्या यह उनका 'मास्टरस्ट्रोक' है?
सबको आश्चर्य इस बात पर भी है कि उम्र के इस पड़ाव पर भी वे इतनी ऊर्जा कहाँ से ला रहे हैं। जानकारों का कहना है कि यह नीतीश कुमार की 'सर्वाइवल स्ट्रैटेजी' है। जब-जब उन्हें राजनीतिक तौर पर हाशिए पर धकेलने की कोशिश हुई है, वे इसी तरह के चौंकाने वाले कदमों से अपनी प्रासंगिकता (relevance) साबित करते रहे हैं।





