दलित रसोइया के हाथ का खाना खाने से बच्चों का इनकार, अभिभावकों ने किया मिड-डे मील का बहिष्कार
ओडिशा के सांगाणवाड़ी में एक दलित रसोइया द्वारा पकाए गए मिड-डे मील का अभिभावकों ने किया बहिष्कार। जातिगत भेदभाव की इस घटना ने प्रशासन को चौंकाया। पढ़ें पूरी रिपोर्ट।
ओडिशा: आधुनिकता और डिजिटल इंडिया के दावों के बीच देश के कुछ हिस्सों से आज भी जातिगत भेदभाव की ऐसी खबरें आती हैं जो समाज की प्रगति पर सवालिया निशान खड़ा कर देती हैं। ताजा मामला ओडिशा के सांगाणवाड़ी (Sanganwadi) इलाके से सामने आया है, जहाँ एक सरकारी स्कूल में दलित महिला रसोइया (Cook) द्वारा तैयार किए गए भोजन को लेकर विवाद खड़ा हो गया है।
क्या है पूरा मामला?
मिली जानकारी के अनुसार, स्कूल में मध्याह्न भोजन (Mid-Day Meal) बनाने के लिए एक दलित महिला को नियुक्त किया गया था। जैसे ही स्थानीय अभिभावकों को इस बात की जानकारी मिली, उन्होंने अपने बच्चों को स्कूल में खाना खाने से मना कर दिया। विरोध इतना बढ़ गया कि कई अभिभावकों ने बच्चों को स्कूल भेजना तक बंद करने की धमकी दी।
अभिभावकों का तर्क है कि वे अपनी "परंपराओं" और "रीति-रिवाजों" के विरुद्ध जाकर किसी निचली जाति के व्यक्ति द्वारा बनाया गया भोजन स्वीकार नहीं कर सकते।
प्रशासन की कार्रवाई और स्थानीय प्रतिक्रिया
इस घटना के सामने आने के बाद शिक्षा विभाग और स्थानीय प्रशासन हरकत में आया है। अधिकारियों ने स्कूल का दौरा किया और अभिभावकों के साथ बैठक कर उन्हें समझाने का प्रयास किया।
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जागरूकता अभियान: प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि जाति के आधार पर किसी भी प्रकार का भेदभाव न केवल अनैतिक है बल्कि कानूनन अपराध भी है।
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सख्त रुख: अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि यदि इस तरह का सामाजिक बहिष्कार जारी रहा, तो प्रशासन को सख्त कदम उठाने पड़ेंगे।
सामाजिक कार्यकर्ताओं में आक्रोश
इस घटना ने सोशल मीडिया और मानवाधिकार संगठनों के बीच तीखी बहस छेड़ दी है। सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि स्कूलों में बच्चों को समानता का पाठ पढ़ाया जाना चाहिए, लेकिन जब अभिभावक ही उनके मन में नफरत के बीज बोएंगे, तो देश का भविष्य कैसा होगा?
"शिक्षा का उद्देश्य केवल साक्षरता नहीं, बल्कि एक समावेशी समाज का निर्माण करना है। सांगाणवाड़ी की यह घटना बताती है कि हमें अभी ज़मीनी स्तर पर बहुत काम करने की ज़रूरत है।" — स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता
कानून क्या कहता है?
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 17 के तहत छुआछूत (Untouchability) को समाप्त कर दिया गया है। इसके अलावा, SC/ST (Prevention of Atrocities) Act के तहत किसी व्यक्ति को उसकी जाति के आधार पर अपमानित करना या उसका बहिष्कार करना दंडनीय अपराध है।
सांगाणवाड़ी की यह घटना केवल एक स्कूल का विवाद नहीं है, बल्कि यह हमारे समाज की उस गहरी जड़ जमा चुकी मानसिकता का प्रतिबिंब है जिसे उखाड़ फेंकना अनिवार्य है। प्रशासन की कोशिशें सराहनीय हैं, लेकिन बदलाव तभी संभव है जब लोग अपनी संकीर्ण मानसिकता को छोड़कर मानवता को प्राथमिकता दें।





