बांग्लादेश चुनाव 2026: क्या छात्र और युवा बदलेंगे सत्ता का समीकरण?
बांग्लादेश चुनाव 2026: क्या ढाका के छात्र और युवा, BNP और जमात-ए-इस्लामी के साथ मिलकर सत्ता का समीकरण बदलेंगे? जानिए अवामी लीग के बिना होने वाले इस ऐतिहासिक चुनाव का पूरा विश्लेषण हिंदी में।
ढाका। बांग्लादेश अपने इतिहास के एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। 12 फरवरी 2026 को होने वाले आम चुनाव न केवल देश की नई सरकार चुनेंगे, बल्कि यह भी तय करेंगे कि शेख हसीना के 15 साल के शासन के अंत के बाद देश किस दिशा में आगे बढ़ेगा। 2024 के छात्र आंदोलन के बाद, जिसने हसीना सरकार का तख्तापलट किया, अब पूरा ध्यान ढाका के युवाओं, छात्र नेताओं और पारंपरिक राजनीतिक दिग्गजों—बीएनपी (BNP) और जमात-ए-इस्लामी पर टिका है।
1. राजनीतिक परिदृश्य: अवामी लीग के बिना चुनाव
इस बार के चुनाव में सबसे बड़ा बदलाव शेख हसीना की पार्टी 'अवामी लीग' की अनुपस्थिति है। अंतरिम सरकार द्वारा पार्टी पर प्रतिबंध लगाए जाने के कारण, यह मुकाबला अब मुख्य रूप से 'बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी' (BNP) और 'जमात-ए-इस्लामी' के बीच सिमट गया है।
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BNP की वापसी: तारिक रहमान के नेतृत्व में BNP खुद को एक उदारवादी और लोकतांत्रिक विकल्प के रूप में पेश कर रही है। 17 साल के निर्वासन के बाद रहमान की वापसी ने पार्टी कार्यकर्ताओं में नई जान फूंक दी है।
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जमात का बढ़ता प्रभाव: कभी हाशिए पर रही जमात-ए-इस्लामी अब एक मजबूत शक्ति बनकर उभरी है। छात्रों के बीच इसकी पकड़ और 'इस्लामी छात्र शिबिर' की हालिया चुनावी जीत ने इसे एक गंभीर दावेदार बना दिया है।
2. छात्रों की भूमिका: 'किंगमेकर' या नई राजनीति?
2024 के तख्तापलट के असली नायक ढाका के छात्र थे। अब वे केवल आंदोलनकारी नहीं, बल्कि राजनेता भी हैं।
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नेशनल सिटीजन पार्टी (NCP): आंदोलन के छात्र नेताओं ने मिलकर NCP का गठन किया है। हालांकि, हाल ही में NCP और जमात-ए-इस्लामी के बीच चुनावी गठबंधन ने छात्रों के भीतर ही मतभेद पैदा कर दिए हैं। कई छात्र नेता जमात की कट्टरपंथी विचारधारा के साथ जुड़ने का विरोध कर रहे हैं।
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नया वोट बैंक: इस चुनाव में लगभग 5.6 करोड़ युवा मतदाता हैं, जो कुल मतदाताओं का 44% हिस्सा हैं। यह 'जनरेशन Z' भ्रष्टाचार मुक्त शासन और रोजगार के वादे पर वोट देने के लिए तैयार है।
3. चुनावी मुद्दे: भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और सुधार
ढाका की सड़कों और चाय की दुकानों पर चर्चा केवल जीत-हार की नहीं, बल्कि बुनियादी बदलावों की है:
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संविधान में सुधार: मतदाता चाहते हैं कि सत्ता का केंद्रीकरण खत्म हो और भविष्य में कोई भी नेता तानाशाह न बन सके।
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अर्थव्यवस्था: बढ़ती महंगाई और बेरोजगारी युवाओं के लिए सबसे बड़ी चिंता है।
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अल्पसंख्यकों की सुरक्षा: हाल के दिनों में हिंदू अल्पसंख्यकों पर हुए हमलों ने सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं, जो चुनाव में एक संवेदनशील मुद्दा बना हुआ है।
4. ढाका की स्थिति और सुरक्षा चुनौतियां
जैसे-जैसे मतदान की तारीख करीब आ रही है, ढाका में राजनीतिक तनाव बढ़ता जा रहा है।
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अब तक कई राजनीतिक कार्यकर्ताओं की हत्या की खबरें आ चुकी हैं।
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अंतरिम सरकार ने शांति बनाए रखने के लिए 9 लाख से अधिक सुरक्षाकर्मियों और सेना की तैनाती की योजना बनाई है।
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ढाका विश्वविद्यालय, जो राजनीति का केंद्र है, वहां 'छात्र दल' (BNP समर्थित) और 'छात्र शिबिर' (जमात समर्थित) के बीच वैचारिक और जमीनी वर्चस्व की जंग तेज हो गई है।





