अंतरिक्ष का बढ़ता 'कचरा' बनेगा मुसीबत: उड़ानों में हो सकती है भारी देरी, वैज्ञानिक रिपोर्ट की बड़ी चेतावनी

अंतरिक्ष मलबे (Space Junk) का बढ़ता खतरा! वैज्ञानिक रिपोर्ट की चेतावनी- 2030 तक इसके कारण विमानों की उड़ानों में हो सकती है भारी देरी। जानें क्या है केसलर सिंड्रोम और भारत के लिए इसके मायने।

अंतरिक्ष का बढ़ता 'कचरा' बनेगा मुसीबत: उड़ानों में हो सकती है भारी देरी, वैज्ञानिक रिपोर्ट की बड़ी चेतावनी
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नई दिल्ली: अब तक हम उड़ानों में देरी (Flight Delays) के लिए खराब मौसम, तकनीकी खराबी या भीड़भाड़ वाले हवाई अड्डों को जिम्मेदार मानते थे। लेकिन वैज्ञानिकों ने एक ऐसी नई चेतावनी दी है जो भविष्य में हवाई यात्रा की तस्वीर बदल सकती है। एक हालिया वैज्ञानिक रिपोर्ट के अनुसार, अंतरिक्ष में जमा हो रहा 'स्पेस जंक' (Space Debris) या मलबा आने वाले समय में विमानों की उड़ानों में बड़े पैमाने पर देरी का कारण बन सकता है।

क्या है यह वैज्ञानिक रिपोर्ट?

'साइंटिफिक रिपोर्ट्स' (Scientific Reports) में प्रकाशित एक शोध के अनुसार, अंतरिक्ष से गिरने वाला मलबा अब केवल उपग्रहों (Satellites) के लिए ही नहीं, बल्कि पृथ्वी के वायुमंडल में उड़ने वाले वाणिज्यिक विमानों के लिए भी खतरा बनता जा रहा है।

  • 2030 तक संकट: अनुमान है कि 2030 तक पृथ्वी की कक्षा में 70,000 से अधिक उपग्रह सक्रिय होंगे।

  • अनियंत्रित वापसी: रिपोर्ट बताती है कि अंतरिक्ष मलबे के अनियंत्रित रूप से पृथ्वी पर गिरने की वार्षिक संभावना लगभग 26% तक पहुँच गई है।

  • हवाई क्षेत्र बंदी: सुरक्षा कारणों से जब भी कोई बड़ा मलबा वायुमंडल में प्रवेश करता है, तो अधिकारियों को उस क्षेत्र का हवाई मार्ग (Airspace) बंद करना पड़ता है, जिससे उड़ानों के मार्ग बदलने पड़ते हैं और भारी देरी होती है।

'केसलर सिंड्रोम' (Kessler Syndrome) का बढ़ता खतरा

वैज्ञानिक विशेष रूप से 'केसलर सिंड्रोम' को लेकर चिंतित हैं। यह एक ऐसी स्थिति है जहाँ अंतरिक्ष में मलबे की मात्रा इतनी अधिक हो जाती है कि वे आपस में टकराकर और अधिक कचरा पैदा करने लगते हैं।

"यह एक चेन रिएक्शन की तरह है। एक टक्कर हजारों नए टुकड़े पैदा करती है, जो अंततः अंतरिक्ष के एक पूरे हिस्से को भविष्य के मिशनों और उड़ानों के लिए 'नो-गो ज़ोन' बना सकती है।"

विमानन उद्योग पर क्या होगा असर?

  1. रूट डाइवर्जन: मलबे के गिरने की आशंका वाले क्षेत्रों से विमानों को दूर रखने के लिए लंबे रास्तों का चयन करना होगा।

  2. ईंधन की खपत: लंबे रास्तों का मतलब है अधिक ईंधन और एयरलाइंस कंपनियों पर आर्थिक बोझ।

  3. यात्रियों की परेशानी: अचानक हवाई मार्ग बंद होने से कनेक्टिंग फ्लाइट्स और यात्रा के समय पर बुरा असर पड़ेगा।

इसरो (ISRO) और भारत की स्थिति

भारत भी इस वैश्विक समस्या से अछूता नहीं है। इसरो ने 'प्रोजेक्ट नेत्रा' (Project NETRA) शुरू किया है ताकि भारतीय अंतरिक्ष संपत्तियों को मलबे से सुरक्षित रखा जा सके। हाल ही में इसरो ने अपने पुराने उपग्रहों (जैसे Cartosat-2) को नियंत्रित तरीके से वापस लाकर अंतरिक्ष की सफाई में योगदान दिया है।

समाधान क्या है?

विशेषज्ञों का कहना है कि अब समय आ गया है जब दुनिया भर की अंतरिक्ष एजेंसियों को 'स्पेस क्लीनिंग' पर ध्यान देना होगा। इसमें शामिल हैं:

  • सक्रिय मलबा हटाना (ADR): पुराने रॉकेट और मृत उपग्रहों को जाल या रोबोटिक आर्म से हटाना।

  • सतत उपग्रह डिजाइन: ऐसे सैटेलाइट बनाना जो मिशन खत्म होने पर खुद-ब-खुद जलकर नष्ट हो जाएं।

  • अंतरराष्ट्रीय नियम: अंतरिक्ष में कचरा फैलाने वाली कंपनियों पर भारी जुर्माना और सख्त नियम।