भगवान विष्णु की आरती: 'ओम जय जगदीश हरे' के बोल, अर्थ और इसे करने की सही विधि
भगवान विष्णु की सबसे लोकप्रिय आरती 'ओम जय जगदीश हरे' के बोल (Lyrics) और अर्थ यहाँ पढ़ें। जानें इस आरती को किसने लिखा और भगवान विष्णु की कृपा पाने के लिए इसे कैसे करें।
भगवान विष्णु की आरती: 'ओम जय जगदीश हरे'—सुख, संपत्ति और शांति का द्वार
हिंदू धर्म में भगवान विष्णु को सृष्टि का 'पालनहार' माना गया है। चाहे सत्यनारायण कथा हो, एकादशी का व्रत हो या दैनिक पूजा, भगवान विष्णु की आरती 'ओम जय जगदीश हरे' के बिना अधूरी मानी जाती है। यह आरती न केवल कानों को सुकून देती है, बल्कि इसके बोल सीधे आत्मा को परमात्मा से जोड़ते हैं।
किसने लिखी है यह आरती?
शायद कम ही लोग जानते होंगे कि हम जो आरती गाते हैं, उसकी रचना 19वीं सदी के अंत में (लगभग 1870 के दशक में) पंडित श्रद्धाराम फिल्लौरी ने की थी। उन्होंने इसे एक ऐसी आरती के रूप में लिखा था जिसे कोई भी, कहीं भी और कभी भी गा सके।
भगवान विष्णु की आरती (हिंदी बोल)
॥ ॐ जय जगदीश हरे ॥
ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे।
भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥
॥ ॐ जय जगदीश हरे ॥
जो ध्यावे फल पावे, दुःख विनसे मन का।
स्वामी दुःख विनसे मन का।
सुख सम्पति घर आवे, सुख सम्पति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥
॥ ॐ जय जगदीश हरे ॥
मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूँ मैं किसकी।
स्वामी शरण गहूँ मैं किसकी।
तुम बिन और न दूजा, तुम बिन और न दूजा, आस करूँ जिसकी॥
॥ ॐ जय जगदीश हरे ॥
तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी।
स्वामी तुम अन्तर्यामी।
पारब्रह्म परमेश्वर, पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सब के स्वामी॥
॥ ॐ जय जगदीश हरे ॥
तुम करुणा के सागर, तुम पालन-कर्ता।
स्वामी तुम पालन-कर्ता।
मैं मूरख खल कामी, मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥
॥ ॐ जय जगदीश हरे ॥
तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।
स्वामी सबके प्राणपति।
किस विधि मिलूँ दयामय, किस विधि मिलूँ दयामय, तुमको मैं कुमति॥
॥ ॐ जय जगदीश हरे ॥
दीनबन्धु दुखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे।
स्वामी तुम ठाकुर मेरे।
अपने हाथ उठाओ, अपने शरण लगाओ, द्वार पड़ा तेरे॥
॥ ॐ जय जगदीश हरे ॥
विषय-विकार मिटाओ, पाप हरो देवा।
स्वामी पाप हरो देवा।
श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ, श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ, सन्तन की सेवा॥
॥ ॐ जय जगदीश हरे ॥
आरती का आध्यात्मिक अर्थ (Significance)
इस आरती की हर पंक्ति एक गहरे समर्पण को दर्शाती है:
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"क्षण में दूर करे": यह भगवान की अनंत शक्ति पर विश्वास है कि वे भक्तों के कष्ट पल भर में हर लेते हैं।
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"तेरा तुझको अर्पण": यह त्याग की पराकाष्ठा है। हम जो कुछ भी जीवन में पाते हैं, वह अंत में ईश्वर को ही समर्पित कर देते हैं क्योंकि हमारा अपना कुछ नहीं है।
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"श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ": यह संसार की माया से हटकर ईश्वर की भक्ति में लीन होने की प्रार्थना है।
आरती करने की सही विधि (Puja Vidhi)
भगवान विष्णु की कृपा पाने के लिए आरती करते समय इन बातों का ध्यान रखें:
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दीपक: शुद्ध देसी घी का दीपक जलाएं। विष्णु जी को पीला रंग प्रिय है, इसलिए आप पूजा में पीले फूलों का प्रयोग करें।
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तुलसी दल: भगवान विष्णु की पूजा में तुलसी का पत्ता अनिवार्य है, लेकिन ध्यान रखें कि शाम के समय तुलसी न तोड़ें।
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विधि: आरती की थाली को भगवान की मूर्ति के सामने गोल घुमाते हुए आरती गाएं।
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प्रसाद: मिश्री, पंचामृत या ऋतु फल का भोग लगाएं।
भगवान विष्णु की आरती करने से मन को शांति मिलती है और घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। यदि आप इसे पूरी श्रद्धा और इसके अर्थ को समझते हुए करेंगे, तो निश्चित रूप से आपके जीवन के कष्ट मिटेंगे और सुख-शांति का आगमन होगा।





