सबरीमाला विवाद में नया मोड़: क्या फिर लगेगी 10-50 वर्ष की महिलाओं पर रोक? केरल सरकार का बड़ा 'U-Turn' और सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई
सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर सुप्रीम कोर्ट की 9-जजों की बेंच की सुनवाई के बीच केरल सरकार के रुख में बड़ा बदलाव। जानिए क्या फिर से बहाल होगी पुरानी परंपरा?
सबरीमाला विवाद: क्या 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर फिर लगेगी रोक? केरल सरकार
के बदले रुख ने बढ़ाई हलचल
तिरुवनंतपुरम/नई दिल्ली | 16 मार्च 2026 : केरल का प्रसिद्ध सबरीमाला मंदिर (Sabarimala Temple) एक बार फिर देश की सबसे बड़ी अदालत और राजनीतिक चर्चाओं के केंद्र में है। सुप्रीम कोर्ट की 9-जजों की संविधान पीठ द्वारा धार्मिक स्वतंत्रता और परंपराओं पर की जा रही ऐतिहासिक सुनवाई के बीच, केरल सरकार के 'U-Turn' ने इस विवाद को एक नया मोड़ दे दिया है।
श्रद्धालुओं और कानूनी विशेषज्ञों के बीच अब सबसे बड़ा सवाल यही है: क्या 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं के प्रवेश पर फिर से पाबंदी लगेगी?
1. 9-जजों की बेंच और 'बड़ा सवाल'
सुप्रीम कोर्ट की यह विशेष पीठ केवल सबरीमाला ही नहीं, बल्कि मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश और पारसी महिलाओं के अधिकारों जैसे व्यापक धार्मिक मुद्दों पर विचार कर रही है। कोर्ट यह तय करने की कोशिश कर रहा है कि क्या 'संवैधानिक नैतिकता' (Constitutional Morality) किसी धर्म की 'अनिवार्य प्रथाओं' (Essential Religious Practices) पर हावी हो सकती है।
2. केरल सरकार का बड़ा 'U-Turn'
2018 के ऐतिहासिक फैसले के समय जहाँ केरल की वामपंथी सरकार ने महिलाओं के प्रवेश का पुरजोर समर्थन किया था, वहीं अब सरकार के रुख में नरमी और बदलाव देखा जा रहा है।
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परंपरा का सम्मान: राज्य सरकार ने अब संकेत दिए हैं कि वे मंदिर के रीति-रिवाजों और 'तंत्री' (मुख्य पुजारी) की राय को प्राथमिकता देने के पक्ष में हैं।
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भक्तों की भावना: चुनावों और जमीनी विरोध को देखते हुए, सरकार अब 'बीच का रास्ता' निकालने की कोशिश कर रही है, जिससे करोड़ों अय्यप्पा भक्तों की भावनाएं आहत न हों।
3. विवाद की जड़: परंपरा बनाम अधिकार
सबरीमाला मंदिर में भगवान अय्यप्पा 'नैष्ठिक ब्रह्मचारी' के रूप में विराजमान हैं। इसी मान्यता के कारण सदियों से 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं (रजस्वला आयु वर्ग) का प्रवेश वर्जित रहा है।
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पक्ष: याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यह प्रतिबंध भेदभावपूर्ण है और अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन करता है।
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विपक्ष: भक्तों और मंदिर बोर्ड का कहना है कि यह 'लिंग भेद' नहीं बल्कि 'देवता की प्रकृति' से जुड़ी एक धार्मिक अनिवार्यता है, जिसे अनुच्छेद 25 के तहत संरक्षण प्राप्त है।
4. सुनवाई का संभावित असर
अगर 9-जजों की बेंच यह तय करती है कि धार्मिक परंपराओं में अदालत का हस्तक्षेप सीमित होना चाहिए, तो:
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पुरानी स्थिति बहाल: सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश पर फिर से वही प्रतिबंध लग सकते हैं जो 2018 से पहले थे।
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धार्मिक संस्थाओं की स्वायत्तता: यह फैसला भविष्य के लिए नजीर बनेगा कि मंदिर, मस्जिद या गुरुद्वारे अपने नियम खुद तय कर सकते हैं या नहीं।
सबरीमाला का मुद्दा अब सिर्फ कानून का नहीं, बल्कि आस्था और संवैधानिक अधिकारों के बीच के संतुलन का है। 9-जजों की बेंच का फैसला भारत के न्यायिक इतिहास में मील का पत्थर साबित होगा। फिलहाल, केरल सरकार के बदले रुख ने उन करोड़ों भक्तों को नई उम्मीद दी है जो सदियों पुरानी परंपरा को बनाए रखना चाहते हैं।





