ईरान-इजरायल युद्ध: क्या भारत बनेगा 'शांतिदूत'? फिनलैंड के राष्ट्रपति अलेक्जेंडर स्टब ने दुनिया को दिया बड़ा सुझाव!

फिनलैंड के राष्ट्रपति अलेक्जेंडर स्टब ने कहा है कि भारत में ईरान-इजरायल संघर्ष को शांत करने की क्षमता है। जानें क्यों दुनिया अब शांति के लिए पीएम मोदी और भारत की ओर देख रही है।

ईरान-इजरायल युद्ध: क्या भारत बनेगा 'शांतिदूत'? फिनलैंड के राष्ट्रपति अलेक्जेंडर स्टब ने दुनिया को दिया बड़ा सुझाव!
क्या भारत बनेगा 'शांतिदूत'

ईरान-इजरायल युद्ध के बीच 'विश्व गुरु' की गूंज: फिनलैंड के राष्ट्रपति ने बताया- क्यों भारत ही करा सकता है शांति?

नई दिल्ली/हेलसिंकी: मध्य पूर्व (Middle East) में ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव ने पूरी दुनिया को तीसरे विश्व युद्ध की कगार पर खड़ा कर दिया है। जहाँ एक तरफ महाशक्तियाँ खेमों में बंटी नजर आ रही हैं, वहीं दूसरी तरफ फिनलैंड के राष्ट्रपति अलेक्जेंडर स्टब (Alexander Stubb) ने एक ऐसा बयान दिया है जिसने वैश्विक कूटनीति में भारत के बढ़ते कद को फिर से साबित कर दिया है।

राष्ट्रपति स्टब का मानना है कि भारत इस समय दुनिया का वह एकमात्र देश है, जो ईरान और इजरायल के बीच शांति का पुल (Bridge) बन सकता है।

अलेक्जेंडर स्टब ने क्या कहा?

फिनलैंड के राष्ट्रपति ने हाल ही में एक अंतरराष्ट्रीय मंच पर चर्चा के दौरान कहा कि वर्तमान भू-राजनीतिक (Geopolitical) स्थितियों में भारत की स्थिति 'यूनिक' है। उन्होंने तर्क दिया कि भारत के संबंध इजरायल के साथ भी बेहद मजबूत हैं और ईरान के साथ भी उसके ऐतिहासिक और रणनीतिक रिश्ते रहे हैं।

राष्ट्रपति स्टब के अनुसार:

"आज की दुनिया में जब पश्चिमी देश और अन्य महाशक्तियां किसी एक पक्ष की ओर झुकी नजर आती हैं, तब भारत अपनी 'गुटनिरपेक्षता' और 'सबका साथ' की नीति के कारण एक विश्वसनीय मध्यस्थ (Mediator) के रूप में उभरता है।"

भारत ही क्यों? 3 बड़े कारण

विशेषज्ञों का मानना है कि राष्ट्रपति स्टब का सुझाव केवल एक बयान नहीं, बल्कि जमीनी हकीकत है। इसके पीछे तीन मुख्य कारण हैं:

  1. संतुलित विदेशी नीति: भारत ने हमेशा से ही ईरान के साथ चाबहार बंदरगाह जैसे महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स पर काम किया है, वहीं इजरायल भारत का सबसे भरोसेमंद रक्षा और तकनीक साझेदार है। भारत दोनों देशों से सीधे संवाद करने की क्षमता रखता है।

  2. पीएम मोदी की वैश्विक स्वीकार्यता: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि एक ऐसे वैश्विक नेता की है जो 'युद्ध के युग' को समाप्त करने की बात करते हैं। यूक्रेन संकट के दौरान भी उनके बयान "यह युद्ध का युग नहीं है" को पूरी दुनिया ने सराहा था।

  3. ग्लोबल साउथ की आवाज: भारत वर्तमान में 'ग्लोबल साउथ' (विकासशील देशों) का नेतृत्व कर रहा है। मध्य पूर्व में अस्थिरता का सबसे बुरा असर इन्हीं देशों की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है, इसलिए भारत का हित शांति में ही है।

ईरान-इजरायल संघर्ष और भारत की चुनौती

ईरान और इजरायल के बीच का संघर्ष केवल दो देशों की जंग नहीं है, बल्कि यह कच्चे तेल की कीमतों और वैश्विक व्यापार मार्गों (जैसे स्ट्रेट ऑफ होर्मुज) की सुरक्षा से जुड़ा है। यदि भारत इसमें मध्यस्थता करता है, तो यह न केवल क्षेत्रीय शांति के लिए बड़ी उपलब्धि होगी, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था को भी बड़ी राहत मिलेगी।

फिनलैंड के राष्ट्रपति का यह सुझाव इस बात की पुष्टि करता है कि अब दुनिया को केवल अमेरिका या रूस से समाधान की उम्मीद नहीं है, बल्कि वे भारत को एक 'ग्लोबल स्टेबलाइजर' के रूप में देख रहे हैं।


भारत की 'सॉफ्ट पावर' और प्रधानमंत्री मोदी की कूटनीति ने आज हमें उस मुकाम पर पहुँचा दिया है जहाँ फिनलैंड जैसे यूरोपीय देश भी शांति के लिए हमारी ओर देख रहे हैं।