BRICS ने हिलाया अमेरिकी डॉलर का वर्चस्व! 90% ट्रेड अपनी करेंसी में, रूस ने की भारत की तारीफ
BRICS देशों ने 90% से अधिक व्यापार अपनी स्थानीय मुद्राओं में पूरा कर अमेरिकी डॉलर को बड़ा झटका दिया है। जानें रूस ने भारत की वैश्विक लीडरशिप की तारीफ में क्या कहा।
BRICS देशों ने अमेरिकी डॉलर को दिया बड़ा झटका: 90% व्यापार स्थानीय करेंसी में, रूस ने वैश्विक नेतृत्व के लिए भारत की जमकर की तारीफ!
अंतरराष्ट्रीय डेस्क: वैश्विक अर्थव्यवस्था में दशकों से कायम अमेरिकी डॉलर के वर्चस्व (Dollar Hegemony) को अब तक का सबसे बड़ा झटका लगा है। बीआरआईसीएस (BRICS) समूह के सदस्य देशों ने आपस में होने वाले व्यापार का 90% से अधिक हिस्सा अपनी स्थानीय मुद्राओं (Local Currencies) में पूरा कर एक ऐतिहासिक मील का पत्थर हासिल कर लिया है। इस बीच, रूस ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की बढ़ती भूमिका और दूरदर्शी कूटनीतिक नेतृत्व की खुलकर सराहना की है।
डॉलर पर दुनिया की निर्भरता कम करने की इस प्रक्रिया (De-Dollarization) ने पश्चिमी देशों और विशेषकर वाशिंगटन के वित्तीय विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है। आइए समझते हैं कि कैसे BRICS देशों का यह कदम वैश्विक वित्तीय संतुलन को हमेशा के लिए बदल रहा है।
1. 90% व्यापार अपनी करेंसी में: डॉलर का किला कैसे ढहा?
पश्चिम द्वारा रूस पर लगाए गए कड़े आर्थिक प्रतिबंधों और SWIFT सिस्टम से बेदखल करने के कदम के बाद BRICS देशों ने अपनी भुगतान प्रणाली को मजबूत करने का काम तेज कर दिया था।
-
रुपया-रूबल और युआन-रूबल ट्रेड: भारत और रूस के बीच द्विपक्षीय व्यापार अब मुख्य रूप से भारतीय रुपये और रूसी रूबल में हो रहा है। इसी तरह चीन और रूस के बीच 90% से अधिक व्यापार युआन में निपट रहा है।
-
लेन-देन लागत में कमी: अपनी राष्ट्रीय मुद्राओं में व्यापार करने से इन देशों को डॉलर में करेंसी कन्वर्जन (Currency Conversion) के अतिरिक्त शुल्क से राहत मिली है।
-
प्रतिबंधों से सुरक्षा: स्थानीय मुद्राओं का उपयोग अंतरराष्ट्रीय वित्तीय प्रणालियों और प्रतिबंधों के दबाव से सुरक्षा कवच प्रदान करता है।
2. रूस ने क्यों की भारत के नेतृत्व की तारीफ?
रूस के शीर्ष नेतृत्व और कूटनीतिज्ञों ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत के स्वतंत्र और संतुलित विदेश नीति दृष्टिकोण की सराहना की है:
-
ग्लोबल साउथ की आवाज: रूस ने स्वीकार किया कि भारत 'ग्लोबल साउथ' (विकासशील देशों) के हितों को वैश्विक स्तर पर मजबूती से उठा रहा है।
-
संतुलित कूटनीति: पश्चिमी दबाव के बावजूद भारत ने अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखा और ऊर्जा सुरक्षा तथा राष्ट्रीय सुरक्षा से कोई समझौता नहीं किया।
-
BRICS पेमेंट्स सिस्टम: ब्रिक्स के डिजिटल पेमेंट प्लेटफॉर्म और लोकल करेंसी सेटलमेंट मॉडल को आकार देने में भारत के डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर (जैसे UPI) के अनुभवों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
3. BRICS देशों के इस कदम से वैश्विक बाजार पर क्या असर पड़ेगा?
| प्रभाव क्षेत्र | संभावित परिणाम / बदलाव |
| 1. डॉलर की मांग में कमी | वैश्विक फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व में डॉलर की हिस्सेदारी धीरे-धीरे घट रही है। |
| 2. विकासशील देशों को मजबूती | वैश्विक वित्तीय फैसलों में केवल पश्चिमी देशों (G7) का एकछत्र अधिकार खत्म हो रहा है। |
| 3. नई BRICS मुद्रा की चर्चा | सदस्य देश एक साझा बास्केट करेंसी या डिजिटल करेंसी प्लेटफॉर्म पर गंभीरता से काम कर रहे हैं। |
| 4. पश्चिमी बैंकिंग सेक्टर पर दबाव | अंतरराष्ट्रीय व्यापार में SWIFT के अलावा वैकल्पिक मैसेजिंग प्रणालियों का इस्तेमाल बढ़ रहा है। |
4. भारत के लिए इस बदलाव के क्या मायने हैं?
भारत के लिए यह डी-डॉलराइजेशन दोहरे अवसर लेकर आया है:
-
भारतीय रुपये का अंतरराष्ट्रीयकरण: रूस, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और कई एशियाई देशों के साथ रुपये में व्यापार होने से 'ग्लोबल रुपया' की स्वीकार्यता बढ़ रही है।
-
सस्ती ऊर्जा और कच्चा माल: डॉलर के उतार-चढ़ाव से बचकर भारत अपनी आयात लागत को नियंत्रित करने में सक्षम हुआ है।
-
रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy): भारत बिना किसी गुट में शामिल हुए पूर्व और पश्चिम दोनों के साथ बराबरी के स्तर पर आर्थिक संबंध बना रहा है।
एक नए मल्टी-पोलर वर्ल्ड आर्डर की शुरुआत
BRICS देशों का 90% व्यापार स्थानीय मुद्राओं में ट्रांसफर करना केवल एक आर्थिक आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह एक नए बहुध्रुवीय विश्व (Multi-Polar World) का संकेत है। रूस द्वारा भारत की तारीफ और BRICS का यह आक्रामक आर्थिक मॉडल यह साबित करता है कि आने वाले समय में वैश्विक अर्थव्यवस्था की दिशा और दशा तय करने में भारत और एशियाई शक्तियों का दबदबा रहने वाला है।





